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जया पार्वती व्रत

जया पार्वती व्रत आषाढ़ शुक्ल त्रयोदशी से 5 दिन, मुख्य रूप से गुजरात में, कन्याएँ और विवाहित स्त्रियाँ रखती हैं: जवारे, बिना नमक का भोजन और अंतिम रात जागरण। यहाँ विधि, सामग्री, कथा और नियम हैं।

हर खंड कम से कम दो स्रोतों से मिलाया गया है

अंतिम जाँच:

यह व्रत कब रखा जाता है

आषाढ़ शुक्ल त्रयोदशी (प्रदोष काल की पूजा) से 5 दिन, कृष्ण तृतीया तक। पूर्णिमांत पंचांग में अंतिम दिन श्रावण कृष्ण तृतीया कहलाता है, और गुजरात के अमांत पंचांग में आषाढ़ कृष्ण तृतीया। अंतिम रात जागरण होता है और अगले दिन व्रत खोला जाता है।

इस व्रत के बारे में

जया पार्वती व्रत मुख्य रूप से गुजरात में रखा जाने वाला 5 दिन का व्रत है। कुंवारी कन्याएँ इसे अच्छे जीवनसाथी की कामना से और विवाहित स्त्रियाँ सुखी दांपत्य की कामना से रखती हैं। इसमें पार्वती और शिव की पूजा होती है।

पहले दिन मिट्टी के पात्र में गेहूँ या जौ बोकर जवारे उगाए जाते हैं और रोज उनकी पूजा होती है। इन दिनों नमक नहीं खाया जाता। पाँचवीं रात जागरण होता है और अगले दिन जवारों का विसर्जन करके व्रत खोला जाता है।

पूजा सामग्री

  • मिट्टी का पात्र, मिट्टी और गेहूँ या जौ के बीज (जवारे)
  • लाल कपड़ा और पार्वती का चित्र
  • फूल, धूप, दीप और कपूर
  • सिंदूर, बिंदी, चूड़ियाँ और मेहंदी
  • पंचामृत और नारियल
  • शिव के लिए बेलपत्र और धतूरा

विधि, क्रम से

हर चरण पूरा होने पर उस पर निशान लगाएँ। निशान दिन खत्म होने तक इसी डिवाइस पर रहते हैं।

व्रत कथा

कथा पढ़ें

कौंडिन्य नगर में वामन नाम का एक ब्राह्मण अपनी पत्नी सत्या के साथ रहता था। घर में किसी चीज की कमी नहीं थी, पर संतान न होने से दोनों दुखी रहते थे।

एक दिन नारद मुनि उनके घर आए। उन्होंने बताया कि नगर के बाहर वन में दक्षिण की ओर एक बेल के पेड़ के नीचे शिव, पार्वती के साथ लिंग रूप में विराजमान हैं, और वहाँ कोई पूजा नहीं करता।

दोनों ने वहाँ जाकर श्रद्धा से पूजा शुरू की और पाँच वर्ष तक नियम से पूजा करते रहे। एक दिन पूजा के लिए फूल तोड़ते समय ब्राह्मण को साँप ने डस लिया और उसके प्राण चले गए।

देर तक न लौटने पर सत्या उसे ढूँढती हुई वन में पहुँची। पति की यह दशा देखकर वह रोने लगी और माता पार्वती को पुकारने लगी। उसकी पुकार सुनकर माता पार्वती प्रकट हुईं और उन्होंने ब्राह्मण के मुख में अमृत डालकर उसे जीवित कर दिया।

फिर देवी ने दोनों को जया पार्वती व्रत करने को कहा। दोनों ने देवी की बताई विधि से व्रत किया, और कुछ समय बाद उनके घर एक पुत्र का जन्म हुआ।

नियम और किन बातों से बचें

  • व्रत के दिनों में नमक बिल्कुल नहीं लिया जाता।
  • अनाज, दालें और कई सब्जियाँ नहीं ली जातीं; फल, दूध, दही और गेहूँ के आटे-गुड़ से बनी मिठाई ली जा सकती है।
  • इन दिनों जमीन पर सोने और ब्रह्मचर्य का नियम बताया गया है।
  • जिन्हें स्वास्थ्य के कारण उपवास कठिन हो, वे डॉक्टर की सलाह से ही व्रत रखें।

लोग अक्सर पूछते हैं

जया पार्वती व्रत कब से कब तक है?

आषाढ़ शुक्ल त्रयोदशी से 5 दिन, कृष्ण तृतीया तक; अंतिम रात जागरण और अगले दिन पारण।

इस व्रत में क्या खाते हैं?

नमक के बिना भोजन। फल, दूध, दही और गेहूँ के आटे व गुड़ की मिठाई ली जा सकती है; अनाज, दालें और कई सब्जियाँ नहीं ली जातीं। व्रत खोलते समय गेहूँ की रोटी और दूध या खीर ली जाती है।

गौरी व्रत से यह कैसे अलग है?

गौरी व्रत आषाढ़ शुक्ल एकादशी से पूर्णिमा तक है, और जया पार्वती व्रत त्रयोदशी से शुरू होकर कृष्ण तृतीया तक। दोनों के कुछ दिन साथ पड़ते हैं; कुछ पेज दोनों को एक ही मानते हैं।