श्री सूर्य नारायण आरती – जय कश्यप नन्दन
जय कश्यप-नन्दन, ॐ जय अदिति-नन्दन – भगवान सूर्य नारायण की पारंपरिक आरती का सम्पूर्ण पाठ, रविवार व संक्रान्ति के सूर्य-पूजन के लिए।
हर खंड कम से कम दो स्रोतों से मिलाया गया है
अंतिम जाँच:
- रचयिता और परंपरा
पारंपरिक पाठ।
- कब पढ़ा जाता है
रविवार, मकर संक्रान्ति, रथ सप्तमी और छठ के सूर्य-पूजन में यह आरती गाई जाती है।
इस पाठ के बारे में
यह आरती भगवान सूर्य नारायण को समर्पित है, जिन्हें महर्षि कश्यप और देवी अदिति के पुत्र के रूप में संबोधित किया गया है। इसके रचयिता के बारे में निश्चित जानकारी उपलब्ध नहीं है।
पाठ
जय कश्यप-नन्दन, ॐ जय अदिति-नन्दन ।
त्रिभुवन-तिमिर-निकन्दन, भक्त-हृदय-चन्दन ॥
॥ जय कश्यप-नन्दन, ॐ जय अदिति-नन्दन ॥अर्थ
हे कश्यप-पुत्र, हे अदिति-पुत्र सूर्य नारायण, आपकी जय हो। आप तीनों लोकों का अंधकार मिटाने वाले और भक्तों के हृदय को चंदन जैसी ठंडक देने वाले हैं।
सप्त-अश्वरथ राजित, एक चक्रधारी ।
दुःखहारी, सुखकारी, मानस-मल-हारी ॥
॥ जय कश्यप-नन्दन, ॐ जय अदिति-नन्दन ॥अर्थ
आप सात घोड़ों वाले रथ पर विराजते हैं, जिसका एक ही पहिया है। आप दुख हरने वाले, सुख देने वाले और मन का मैल हरने वाले हैं।
सुर-मुनि-भूसुर-वन्दित, विमल विभवशाली ।
अघ-दल-दलन दिवाकर, दिव्य किरण माली ॥
॥ जय कश्यप-नन्दन, ॐ जय अदिति-नन्दन ॥अर्थ
देवता, मुनि और ब्राह्मण आपकी वंदना करते हैं; आप निर्मल वैभव वाले हैं। हे दिवाकर, आप पापों के समूह का नाश करने वाले और दिव्य किरणों की माला धारण करने वाले हैं।
सकल-सुकर्म-प्रसविता, सविता शुभकारी ।
विश्व-विलोचन मोचन, भव-बन्धन भारी ॥
॥ जय कश्यप-नन्दन, ॐ जय अदिति-नन्दन ॥अर्थ
आप सब अच्छे कर्मों को जन्म देने वाले, कल्याणकारी सविता हैं। आप विश्व के नेत्र हैं; आरती के अनुसार आप संसार के भारी बंधन से छुड़ाने वाले हैं।
कमल-समूह विकासक, नाशक त्रय तापा ।
सेवत सहज हरत अति, मनसिज-संतापा ॥
॥ जय कश्यप-नन्दन, ॐ जय अदिति-नन्दन ॥अर्थ
आप कमलों के समूह को खिलाने वाले और तीनों तापों का नाश करने वाले हैं। आरती के अनुसार आपकी सेवा सहज ही मन के कामजन्य संताप को हर लेती है।
नेत्र-व्याधि हर सुरवर, भू-पीड़ा-हारी ।
वृष्टि विमोचन संतत, परहित व्रतधारी ॥
॥ जय कश्यप-नन्दन, ॐ जय अदिति-नन्दन ॥अर्थ
हे श्रेष्ठ देव, आरती में आपको नेत्रों की पीड़ा और धरती की पीड़ा हरने वाला कहा गया है। आप सदा वर्षा देने वाले और दूसरों के हित का व्रत धारण करने वाले हैं।
सूर्यदेव करुणाकर, अब करुणा कीजै ।
हर अज्ञान-मोह सब, तत्त्वज्ञान दीजै ॥
॥ जय कश्यप-नन्दन, ॐ जय अदिति-नन्दन ॥अर्थ
हे करुणा करने वाले सूर्यदेव, अब कृपा कीजिए। सारा अज्ञान और मोह हरकर हमें तत्त्व का ज्ञान दीजिए।
इस पाठ के बारे में
सार्वजनिक (कॉपीराइट से मुक्त): पारंपरिक पाठ (पारंपरिक)।
पारंपरिक पाठ वैसा ही दिया गया है जैसा प्रचलित छपे संस्करणों में मिलता है। इस पेज का हर अर्थ हमने अपने शब्दों में लिखा है।
