शुक्र मंत्र
शुक्र ग्रह के मंत्र – शुक्ल यजुर्वेद का वैदिक मंत्र, नवग्रह स्तोत्र का पौराणिक श्लोक, तांत्रिक बीज मंत्र और एकाक्षरी मंत्र संस्कृत में।
हर खंड कम से कम दो स्रोतों से मिलाया गया है
अंतिम जाँच:
- रचयिता और परंपरा
पारंपरिक पाठ।
- कब पढ़ा जाता है
इनका जप प्रायः शुक्रवार को, नवग्रह पूजा अथवा ग्रह-शांति अनुष्ठान में किया जाता है।
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इस पाठ के बारे में
ये मंत्र नवग्रहों में से शुक्र ग्रह (भृगुपुत्र, दैत्यगुरु शुक्राचार्य) को समर्पित हैं। इसमें शुक्ल यजुर्वेद (१९.७५) का वैदिक मंत्र, व्यासरचित नवग्रह स्तोत्र का श्लोक तथा परंपरा में प्रचलित बीज मंत्र दिए गए हैं।
पाठ
॥ वैदिक मंत्र ॥
ॐ अन्नात्परिस्रुतो रसं ब्रह्मणा व्यपिबत्क्षत्रं पयः सोमं प्रजापतिः ।
ऋतेन सत्यमिन्द्रियं विपानं शुक्रमन्धस इन्द्रस्येन्द्रियमिदं पयोऽमृतं मधु ॥अर्थ
प्रजापति ने वेद-ज्ञान के द्वारा अन्न से निकला रस, बल, दूध और सोम पिया; सत्य के द्वारा इंद्र की शक्ति, शुद्ध पेय, दूध, अमृत और मधु प्रकट हुए। (शुक्ल यजुर्वेद १९.७५)
॥ पौराणिक मंत्र ॥
हिमकुन्दमृणालाभं दैत्यानां परमं गुरुम् ।
सर्वशास्त्रप्रवक्तारं भार्गवं प्रणमाम्यहम् ॥अर्थ
बर्फ, कुंद के फूल और कमल-नाल जैसे उजले, दैत्यों के परम गुरु, सब शास्त्रों के वक्ता, भृगु-पुत्र शुक्र को मैं प्रणाम करता हूँ।
॥ तांत्रिक बीज मंत्र ॥
ॐ द्रां द्रीं द्रौं सः शुक्राय नमः ॥अर्थ
'द्रां द्रीं द्रौं सः' बीजों के साथ शुक्र को नमस्कार है।
॥ एकाक्षरी बीज मंत्र ॥
ॐ शुं शुक्राय नमः ॥अर्थ
'शुं' बीज के साथ शुक्र को नमस्कार है।
इस पाठ के बारे में
सार्वजनिक (कॉपीराइट से मुक्त): पारंपरिक पाठ (पारंपरिक)।
पारंपरिक पाठ वैसा ही दिया गया है जैसा प्रचलित छपे संस्करणों में मिलता है। इस पेज का हर अर्थ हमने अपने शब्दों में लिखा है।
