श्री चिंतपूर्णी चालीसा
श्री चिंतपूर्णी चालीसा "चित्त में बसो चिंतपूर्णी, छिन्नमस्तिका मात" का पूरा पाठ हिंदी में। नवरात्रि व देवी-पूजा में पढ़ा जाने वाला चालीसा।
हर खंड कम से कम दो स्रोतों से मिलाया गया है
अंतिम जाँच:
- रचयिता और परंपरा
पारंपरिक पाठ।
- कब पढ़ा जाता है
इसके रचयिता का नाम पाठ में नहीं है; नवरात्रि, सावन के मेले और नित्य देवी-पूजा में इसका पाठ किया जाता है।
इस पाठ के बारे में
यह चालीसा हिमाचल प्रदेश के ऊना जिले में स्थित शक्तिपीठ की अधिष्ठात्री माँ चिंतपूर्णी को समर्पित है, जिन्हें छिन्नमस्तिका का स्वरूप माना जाता है। इसमें भक्त माईदास, मंदिर के परिसर और वहाँ के उत्सवों का वर्णन मिलता है।
पाठ
दोहा
चित्त में बसो चिंतपूर्णी, छिन्नमस्तिका मात।
सात बहनों में लाड़ली, हो जग में विख्यात॥अर्थ
हे छिन्नमस्तिका माँ चिंतपूर्णी, मेरे चित्त में बसिए। आप सात बहनों में लाड़ली हैं और संसार में प्रसिद्ध हैं।
दोहा
माईदास पर की कृपा, रूप दिखाया श्याम।
सबकी हो वरदायनी, शक्ति तुम्हें प्रणाम॥अर्थ
आपने भक्त माईदास पर कृपा की और उन्हें अपना रूप दिखाया। आप सबको वर देने वाली हैं; हे शक्ति, आपको प्रणाम।
चौपाई
छिन्नमस्तिका मात भवानी।
कलिकाल में शुभ कल्याणी॥अर्थ
हे छिन्नमस्तिका माँ भवानी, आप कलियुग में शुभ और कल्याण करने वाली हैं।
चौपाई
सती आपको अंश दियो है।
चिंतपूर्णी नाम कियो है॥अर्थ
सती ने आपको अपना अंश दिया, और आपका नाम चिंतपूर्णी पड़ा।
चौपाई
चरणों की लीला है न्यारी।
जिनको पूजे हर नर-नारी॥अर्थ
आपके चरणों की लीला निराली है; हर स्त्री-पुरुष उनकी पूजा करता है।
चौपाई
देवी-देवता हैं नत मस्तक।
चैन ना पाए भजे ना जब तक॥अर्थ
देवी-देवता भी आपके आगे सिर झुकाते हैं; जब तक आपको न भजें, उन्हें चैन नहीं मिलता।
चौपाई
शांत रूप सदा मुस्काता।
जिसे देखकर आनंद आता॥अर्थ
आपका शांत रूप सदा मुस्कुराता रहता है, जिसे देखकर आनंद आता है।
चौपाई
एक ओर कालेश्वर साजे।
दूजी ओर शिवबाडी विराजे॥अर्थ
आपके एक ओर कालेश्वर महादेव शोभित हैं और दूसरी ओर शिवबाड़ी विराजती है।
चौपाई
तीसरी ओर नारायण देव।
चौथी ओर मचकुंद महादेव॥अर्थ
तीसरी ओर नारायण देव हैं और चौथी ओर मचकुंद महादेव हैं।
चौपाई
लक्ष्मी नारायण संग विराजे।
दस अवतार उन्हीं में साजे॥अर्थ
वहाँ लक्ष्मी-नारायण साथ विराजते हैं और उनमें दसों अवतार शोभित हैं।
चौपाई
तीनों द्वार भवन के अंदर।
बैठे ब्रह्मा विष्णु और शिवशंकर॥अर्थ
भवन के भीतर तीनों द्वारों पर ब्रह्मा, विष्णु और शिवशंकर बैठे हैं।
चौपाई
काली लक्ष्मी सरस्वती माँ।
सत रज तम से व्याप्त हुई माँ॥अर्थ
माँ काली, लक्ष्मी और सरस्वती के रूप में आप सत, रज और तम — तीनों गुणों में व्याप्त हैं।
चौपाई
हनुमान योद्धा बलकारी।
मार रहे भैरव किलकारी॥अर्थ
बलशाली योद्धा हनुमान वहाँ हैं, और भैरव किलकारी मार रहे हैं।
चौपाई
चौंसठ योगिनी मंगल गावें।
मृदंग छैने महंत बजावें॥अर्थ
चौंसठ योगिनियाँ मंगल गीत गाती हैं, और महंत मृदंग और छैने बजाते हैं।
चौपाई
भवन के नीचे बावड़ी सुंदर।
जिसमें जल बहता है झरझर॥अर्थ
भवन के नीचे एक सुंदर बावड़ी है, जिसमें झर-झर पानी बहता है।
चौपाई
संत आरती करें तुम्हारी।
तुमने सदा पूजत हैं नर-नारी॥अर्थ
संत आपकी आरती करते हैं, और स्त्री-पुरुष सदा आपकी पूजा करते हैं।
चौपाई
पास है जिसके बाग निराला।
जहां है पुष्पों की वनमाला॥अर्थ
पास में एक अनोखा बाग है, जहाँ फूलों की वनमाला है।
चौपाई
कंठ आपके माला विराजे।
सुहा-सुहा चोला अंग साजे॥अर्थ
आपके कंठ में माला शोभित है और अंगों पर लाल-लाल चोला सजा है।
चौपाई
सिंह यहां संध्या को आता।
शुभ चरणों में शीश नवाता॥अर्थ
यहाँ संध्या के समय सिंह आता है और आपके शुभ चरणों में सिर झुकाता है।
चौपाई
निकट आपके जो भी आवे।
पिंडी रूप दर्शन पावे॥अर्थ
जो भी आपके पास आता है, वह पिंडी रूप में आपके दर्शन पाता है।
चौपाई
रणजीत सिंह महाराज बनाया।
तुम्हें स्वर्ण का छत्र चढ़ाया॥अर्थ
महाराज रणजीत सिंह ने आपको सोने का छत्र चढ़ाया।
चौपाई
भाव तुम्हीं से भक्ति पाया।
पटियाला मंदिर बनवाया॥अर्थ
आपसे ही भक्ति का भाव पाकर पटियाला में मंदिर बनवाया गया।
चौपाई
माईदास पर कृपा करके।
आई भरवई पास विचर के॥अर्थ
माईदास पर कृपा करके आप घूमती हुई भरवाई के पास आईं।
चौपाई
अठूर क्षेत्र मुगलों ने घेरा।
पिता माईदास ने टेरा॥अर्थ
जब मुगलों ने अठूर क्षेत्र को घेर लिया, तब पिता माईदास ने आपको पुकारा।
चौपाई
अम्ब क्षेत्र के पास में आए।
तीन पुत्र कृपा से पाये॥अर्थ
वे अम्ब क्षेत्र के पास आए और आपकी कृपा से तीन पुत्र पाए।
चौपाई
वंश माई ने फिर पुजवाया।
माईदास को भक्त बनाया॥अर्थ
फिर माँ ने उनके वंश से अपनी पूजा करवाई और माईदास को अपना भक्त बनाया।
चौपाई
सौ घर उसके हैं अपनाए।
सेवा में जो तुमरी आए॥अर्थ
उनके सौ घर आपने अपनाए, जो आपकी सेवा में आए।
चौपाई
चार आरती हैं मंगलमय।
प्रातः मध्य संध्या रातम्य॥अर्थ
आपकी चार आरतियाँ मंगलमय हैं — सुबह, दोपहर, संध्या और रात को।
चौपाई
पान ध्वजा नारियल लाऊं।
हलवे चने का भोग लगाऊं॥अर्थ
मैं पान, ध्वजा और नारियल लाऊँ और हलवे-चने का भोग लगाऊँ।
चौपाई
असौज चैत्र में मेला लगता।
अष्टमी सावन में भी भरता॥अर्थ
आश्विन और चैत्र में मेला लगता है, और सावन की अष्टमी को भी भरता है।
चौपाई
छत्र व चुन्नी शीश चढ़ाऊं।
माला लेकर तुमको ध्याऊं॥अर्थ
मैं आपके सिर पर छत्र और चुन्नी चढ़ाऊँ और माला लेकर आपका ध्यान करूँ।
चौपाई
मुझको मात विपद ने घेरा।
मोहमाया ने डाला फेरा॥अर्थ
हे माँ, मुझे विपत्ति ने घेर लिया है, और मोह-माया ने अपना जाल डाल दिया है।
चौपाई
ज्वालामुखी से तेज हो पातीं।
नगरकोट से भी बल पातीं॥अर्थ
आप ज्वालामुखी से तेज और नगरकोट से बल पाती हैं।
चौपाई
नयना देवी तुम्हें देखकर।
मुस्काती हैं प्रेम में भरकर॥अर्थ
नैना देवी आपको देखकर प्रेम से भरकर मुस्कुराती हैं।
चौपाई
अभिलाषा माँ पूरण कर दो।
हे चिंतपूर्णी झोली भर दो॥अर्थ
हे माँ, मेरी अभिलाषा पूरी कर दो; हे चिंतपूर्णी, मेरी झोली भर दो — यह भक्त की प्रार्थना है।
चौपाई
ममता वाली पलक दिखा दो।
काम क्रोध मद लोभ हटा दो॥अर्थ
अपनी ममता भरी दृष्टि दिखा दो, और काम, क्रोध, मद और लोभ हटा दो।
चौपाई
सुख दुःख तो जीवन में आते।
तेरी दया से दुख मिट जाते॥अर्थ
सुख और दुख तो जीवन में आते रहते हैं; चालीसा के अनुसार आपकी दया से दुख मिट जाते हैं।
चौपाई
तुमको कहते चिंता हरणी।
भयनाशक तुम हो भयहरणी॥अर्थ
आपको चिंता हरने वाली कहते हैं; आप भय का नाश करने वाली, भय हरने वाली हैं।
चौपाई
हर बाधा को आप ही टालो।
इस बालक को गले लगा लो॥अर्थ
हर बाधा को आप ही टालिए और इस बालक को गले लगा लीजिए।
चौपाई
तुम्हरा आशीर्वाद मिले जब।
सुख की कलियां आप खिले सब॥अर्थ
चालीसा के अनुसार जब आपका आशीर्वाद मिलता है, तो सुख की सब कलियाँ अपने-आप खिल जाती हैं।
चौपाई
कहां तक दुर्गे महिमा गाऊं।
द्वार खड़ा ही विनय सुनाऊं॥अर्थ
हे दुर्गे, आपकी महिमा मैं कहाँ तक गाऊँ? मैं आपके द्वार पर खड़ा होकर ही विनती सुनाता हूँ।
चौपाई
चिंतपूर्णी मां मुझे अपनाओ।
भव से नैया पार लगाओ॥अर्थ
हे चिंतपूर्णी माँ, मुझे अपना लो और संसार-सागर से मेरी नैया पार लगाओ।
दोहा
चरण आपके छू रहा हूं, चिंतपूर्णी मात।
चरणामृत दे दीजिए, हो जग में विख्यात॥अर्थ
हे चिंतपूर्णी माँ, मैं आपके चरण छू रहा हूँ; मुझे चरणामृत दीजिए, आप जग में प्रसिद्ध हैं।
इस पाठ के बारे में
सार्वजनिक (कॉपीराइट से मुक्त): पारंपरिक पाठ (पारंपरिक)।
पारंपरिक पाठ वैसा ही दिया गया है जैसा प्रचलित छपे संस्करणों में मिलता है। इस पेज का हर अर्थ हमने अपने शब्दों में लिखा है।
