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दुर्गा सप्तशती: प्राधानिक रहस्य

सप्तशती के तीन रहस्यों में पहला: राजा सुरथ के पूछने पर मेधा ऋषि बताते हैं कि सबकी मूल महालक्ष्मी हैं, जिनसे महाकाली, महासरस्वती और फिर ब्रह्मा, विष्णु, शिव प्रकट हुए। विनियोग सहित 31 श्लोक।

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अंतिम जाँच:

23 में से भाग 19

इस पाठ के बारे में

तीन रहस्यों में पहला। सप्तशती के 13 अध्याय पूरे होने के बाद राजा सुरथ मेधा ऋषि से देवी का मूल स्वरूप और उनकी पूजा की विधि पूछते हैं। ऋषि बताते हैं कि सबका आदि कारण त्रिगुणमयी महालक्ष्मी हैं; उनसे तमोगुण से महाकाली और सत्त्वगुण से महासरस्वती प्रकट हुईं, और तीनों से ब्रह्मा, विष्णु, शिव और उनकी शक्तियाँ। इसकी भाषा दार्शनिक और प्रतीकात्मक है; अर्थ सरल शब्दों में दिया गया है।

पाठ

  1. विनियोग

    ॐ अस्य श्रीसप्तशतीरहस्यत्रयस्य नारायण ऋषिरनुष्टुप्छन्दः, महाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वत्यो देवता यथोक्तफलावाप्त्यर्थं जपे विनियोगः।

    अर्थ

    पाठ से पहले का संकल्प: सप्तशती के इन तीन रहस्यों के ऋषि नारायण हैं, छंद अनुष्टुप है और देवता महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती हैं। ग्रंथ में बताए गए फल की कामना से इनका जप किया जाता है।

  2. श्लोक 1

    राजोवाच
    भगवन्नवतारा मे चण्डिकायास्त्वयोदिताः।
    एतेषां प्रकृतिं ब्रह्मन् प्रधानं वक्तुमर्हसि॥१॥

    अर्थ

    राजा सुरथ ने कहा: भगवन्, आपने मुझे चण्डिका के अवतारों की कथा सुनाई। हे ब्राह्मण, अब इन सबकी मूल प्रकृति, यानी इनका असली आधार, बताने की कृपा करें।

  3. श्लोक 2

    आराध्यं यन्मया देव्याः स्वरूपं येन च द्विज।
    विधिना ब्रूहि सकलं यथावत्प्रणतस्य मे॥२॥

    अर्थ

    हे द्विज, मुझे देवी के किस स्वरूप की आराधना करनी चाहिए और किस विधि से, यह सब ठीक-ठीक बताइए। मैं आपके आगे झुका हूँ।

  4. श्लोक 3

    ऋषिरुवाच
    इदं रहस्यं परममनाख्येयं प्रचक्षते।
    भक्तोऽसीति न मे किञ्चित्तवावाच्यं नराधिप॥३॥

    अर्थ

    ऋषि ने कहा: यह रहस्य सबसे ऊँचा है और इसे किसी से न कहने योग्य बताया जाता है। पर हे राजन्, तुम भक्त हो, इसलिए तुमसे छिपाने लायक मेरे पास कुछ भी नहीं है।

  5. श्लोक 4

    सर्वस्याद्या महालक्ष्मीस्त्रिगुणा परमेश्वरी।
    लक्ष्यालक्ष्यस्वरूपा सा व्याप्य कृत्स्नं व्यवस्थिता॥४॥

    अर्थ

    सबसे पहली और सबकी मूल तीनों गुणों वाली परमेश्वरी महालक्ष्मी हैं। उनका रूप दिखता भी है और नहीं भी दिखता; वे पूरे जगत में फैलकर स्थित हैं।

  6. श्लोक 5

    मातुलुङ्गं गदां खेटं पानपात्रं च बिभ्रती।
    नागं लिङ्गं च योनिं च बिभ्रती नृप मूर्धनि॥५॥

    अर्थ

    हे राजन्, वे अपने हाथों में मातुलुंग (बिजौरा नींबू), गदा, ढाल और पानपात्र धारण करती हैं, और सिर पर नाग, लिंग और योनि के चिह्न धारण करती हैं।

  7. श्लोक 6

    तप्तकाञ्चनवर्णाभा तप्तकाञ्चनभूषणा।
    शून्यं तदखिलं स्वेन पूरयामास तेजसा॥६॥

    अर्थ

    उनकी आभा तपे हुए सोने जैसी है और आभूषण भी तपे हुए सोने के हैं। उन्होंने उस पूरे सूने संसार को अपने तेज से भर दिया।

  8. श्लोक 7

    शून्यं तदखिलं लोकं विलोक्य परमेश्वरी।
    बभार परमं रूपं तमसा केवलेन हि॥७॥

    अर्थ

    उस पूरे लोक को सूना देखकर परमेश्वरी ने केवल तमोगुण से एक और महान रूप धारण किया।

  9. श्लोक 8

    सा भिन्नाञ्जनसङ्काशा दंष्ट्राङ्कितवरानना।
    विशाललोचना नारी बभूव तनुमध्यमा॥८॥

    अर्थ

    वह रूप काजल के ढेर जैसी काली, दाढ़ों से युक्त सुंदर मुख वाली, बड़ी-बड़ी आँखों वाली और पतली कमर वाली एक नारी के रूप में प्रकट हुआ।

  10. श्लोक 9

    खड्गपात्रशिरःखेटैरलङ्कृतचतुर्भुजा।
    कबन्धहारं शिरसा बिभ्राणा हि शिरःस्रजम्॥९॥

    अर्थ

    उनकी चारों भुजाएँ तलवार, पात्र, कटे सिर और ढाल से सजी थीं। वे धड़ों का हार और सिर पर मुंडों की माला धारण किए थीं।

  11. श्लोक 10

    सा प्रोवाच महालक्ष्मीं तामसी प्रमदोत्तमा।
    नाम कर्म च मे मातर्देहि तुभ्यं नमो नमः॥१०॥

    अर्थ

    उस तमोगुणी श्रेष्ठ नारी ने महालक्ष्मी से कहा: माता, मुझे नाम और काम दीजिए। आपको बार-बार नमस्कार है।

  12. श्लोक 11

    तां प्रोवाच महालक्ष्मीस्तामसीं प्रमदोत्तमाम्।
    ददामि तव नामानि यानि कर्माणि तानि ते॥११॥

    अर्थ

    महालक्ष्मी ने उस तमोगुणी श्रेष्ठ नारी से कहा: मैं तुम्हें नाम देती हूँ, और जो तुम्हारे काम होंगे, वे भी बताती हूँ।

  13. श्लोक 12

    महामाया महाकाली महामारी क्षुधा तृषा।
    निद्रा तृष्णा चैकवीरा कालरात्रिर्दुरत्यया॥१२॥

    अर्थ

    महामाया, महाकाली, महामारी, क्षुधा (भूख), तृषा (प्यास), निद्रा, तृष्णा, एकवीरा, कालरात्रि और दुरत्यया (जिसे पार करना कठिन है)।

  14. श्लोक 13

    इमानि तव नामानि प्रतिपाद्यानि कर्मभिः।
    एभिः कर्माणि ते ज्ञात्वा योऽधीते सोऽश्नुते सुखम्॥१३॥

    अर्थ

    ये तुम्हारे नाम हैं, जिनका अर्थ तुम्हारे कामों से समझ में आता है। ग्रंथ के अनुसार जो इन नामों से तुम्हारे कामों को जानकर इनका पाठ करता है, वह सुख पाता है।

  15. श्लोक 14

    तामित्युक्त्वा महालक्ष्मीः स्वरूपमपरं नृप।
    सत्त्वाख्येनातिशुद्धेन गुणेनेन्दुप्रभं दधौ॥१४॥

    अर्थ

    हे राजन्, उससे ऐसा कहकर महालक्ष्मी ने अत्यंत शुद्ध सत्त्व गुण से चंद्रमा जैसी उजली आभा वाला एक और रूप धारण किया।

  16. श्लोक 15

    अक्षमालाङ्कुशधरा वीणापुस्तकधारिणी।
    सा बभूव वरा नारी नामान्यस्यै च सा ददौ॥१५॥

    अर्थ

    वह रूप अक्षमाला, अंकुश, वीणा और पुस्तक धारण करने वाली एक श्रेष्ठ नारी के रूप में प्रकट हुआ, और महालक्ष्मी ने उसे भी नाम दिए।

  17. श्लोक 16

    महाविद्या महावाणी भारती वाक् सरस्वती।
    आर्या ब्राह्मी कामधेनुर्वेदगर्भा च धीश्वरी॥१६॥

    अर्थ

    महाविद्या, महावाणी, भारती, वाक्, सरस्वती, आर्या, ब्राह्मी, कामधेनु, वेदगर्भा और धीश्वरी (बुद्धि की स्वामिनी)।

  18. श्लोक 17

    अथोवाच महालक्ष्मीर्महाकालीं सरस्वतीम्।
    युवां जनयतां देव्यौ मिथुने स्वानुरूपतः॥१७॥

    अर्थ

    फिर महालक्ष्मी ने महाकाली और सरस्वती से कहा: देवियो, तुम दोनों अपने-अपने स्वभाव के अनुरूप एक-एक जोड़ा (स्त्री और पुरुष) उत्पन्न करो।

  19. श्लोक 18

    इत्युक्त्वा ते महालक्ष्मीः ससर्ज मिथुनं स्वयम्।
    हिरण्यगर्भौ रुचिरौ स्त्रीपुंसौ कमलासनौ॥१८॥

    अर्थ

    उनसे ऐसा कहकर महालक्ष्मी ने स्वयं भी एक जोड़ा रचा: सुनहरी आभा वाले, सुंदर, कमल पर बैठे एक स्त्री और एक पुरुष।

  20. श्लोक 19

    ब्रह्मन् विधे विरिञ्चेति धातरित्याह तं नरम्।
    श्रीः पद्मे कमले लक्ष्मीत्याह माता च तां स्त्रियम्॥१९॥

    अर्थ

    माता ने उस पुरुष को ब्रह्मा, विधि, विरंचि और धाता कहकर पुकारा, और उस स्त्री को श्री, पद्मा, कमला और लक्ष्मी कहकर।

  21. श्लोक 20

    महाकाली भारती च मिथुने सृजतः सह।
    एतयोरपि रूपाणि नामानि च वदामि ते॥२०॥

    अर्थ

    महाकाली और भारती (सरस्वती) ने भी एक-एक जोड़ा रचा। उनके रूप और नाम भी मैं तुम्हें बताता हूँ।

  22. श्लोक 21

    नीलकण्ठं रक्तबाहुं श्वेताङ्गं चन्द्रशेखरम्।
    जनयामास पुरुषं महाकाली सितां स्त्रियम्॥२१॥

    अर्थ

    महाकाली ने नीले कंठ, लाल भुजाओं, गोरे शरीर और सिर पर चंद्रमा वाले एक पुरुष को, और एक गोरी स्त्री को जन्म दिया।

  23. श्लोक 22

    स रुद्रः शङ्करः स्थाणुः कपर्दी च त्रिलोचनः।
    त्रयी विद्या कामधेनुः सा स्त्री भाषाक्षरा स्वरा॥२२॥

    अर्थ

    वह पुरुष रुद्र, शंकर, स्थाणु, कपर्दी और त्रिलोचन कहलाया; और वह स्त्री त्रयी, विद्या, कामधेनु, भाषा, अक्षरा और स्वरा कहलाई।

  24. श्लोक 23

    सरस्वती स्त्रियं गौरीं कृष्णं च पुरुषं नृप।
    जनयामास नामानि तयोरपि वदामि ते॥२३॥

    अर्थ

    हे राजन्, सरस्वती ने एक गोरी स्त्री और एक साँवले पुरुष को जन्म दिया। उन दोनों के नाम भी मैं तुम्हें बताता हूँ।

  25. श्लोक 24

    विष्णुः कृष्णो हृषीकेशो वासुदेवो जनार्दनः।
    उमा गौरी सती चण्डी सुन्दरी सुभगा शिवा॥२४॥

    अर्थ

    पुरुष के नाम विष्णु, कृष्ण, हृषीकेश, वासुदेव और जनार्दन हुए; और स्त्री के उमा, गौरी, सती, चण्डी, सुंदरी, सुभगा और शिवा।

  26. श्लोक 25

    एवं युवतयः सद्यः पुरुषत्वं प्रपेदिरे।
    चक्षुष्मन्तो नु पश्यन्ति नेतरेऽतद्विदो जनाः॥२५॥

    अर्थ

    इस तरह वे तीनों देवियाँ तुरंत पुरुष रूप में भी प्रकट हो गईं। इस बात को ज्ञान की आँख वाले ही देख पाते हैं; जो इस तत्त्व को नहीं जानते, वे नहीं।

  27. श्लोक 26

    ब्रह्मणे प्रददौ पत्नीं महालक्ष्मीर्नृप त्रयीम्।
    रुद्राय गौरीं वरदां वासुदेवाय च श्रियम्॥२६॥

    अर्थ

    हे राजन्, महालक्ष्मी ने ब्रह्मा को पत्नी के रूप में त्रयी (सरस्वती) दी, रुद्र को वर देने वाली गौरी और वासुदेव (विष्णु) को श्री (लक्ष्मी)।

  28. श्लोक 27

    स्वरया सह सम्भूय विरिञ्चोऽण्डमजीजनत्।
    बिभेद भगवान् रुद्रस्तद् गौर्या सह वीर्यवान्॥२७॥

    अर्थ

    स्वरा के साथ मिलकर ब्रह्मा ने ब्रह्मांड रूपी अंडे को जन्म दिया, और पराक्रमी भगवान रुद्र ने गौरी के साथ मिलकर उसे तोड़कर खोला।

  29. श्लोक 28

    अण्डमध्ये प्रधानादि कार्यजातमभून्नृप।
    महाभूतात्मकं सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम्॥२८॥

    अर्थ

    हे राजन्, उस अंडे के भीतर प्रकृति से लेकर सारी रचना उत्पन्न हुई: पाँच महाभूतों से बना यह सारा चलने वाला और न चलने वाला जगत।

  30. श्लोक 29

    पुपोष पालयामास तल्लक्ष्म्या सह केशवः।
    सञ्जहार जगत्सर्वं सह गौर्या महेश्वरः॥२९॥

    अर्थ

    केशव (विष्णु) ने लक्ष्मी के साथ उस जगत का पोषण और पालन किया, और महेश्वर (शिव) ने गौरी के साथ सारे जगत का संहार किया।

  31. श्लोक 30

    महालक्ष्मीर्महाराज सर्वसत्त्वमयीश्वरी।
    निराकारा च साकारा सैव नानाभिधानभृत्॥३०॥

    अर्थ

    हे महाराज, सब प्राणियों में व्याप्त ईश्वरी महालक्ष्मी ही निराकार भी हैं और साकार भी; वही अनेक नाम धारण करती हैं।

  32. श्लोक 31

    नामान्तरैर्निरूप्यैषा नाम्ना नान्येन केनचित्॥३१॥
    इति प्राधानिकं रहस्यं सम्पूर्णम्।

    अर्थ

    इन्हें अलग-अलग नामों से ही समझाया जा सकता है, किसी एक नाम से नहीं। यहाँ प्राधानिक रहस्य पूरा होता है।

इस पाठ के बारे में

सार्वजनिक (कॉपीराइट से मुक्त): पारंपरिक पाठ (मार्कण्डेय पुराण के देवी माहात्म्य के साथ पढ़े जाने वाले अंग, परंपरा से प्राप्त)।

पारंपरिक पाठ वैसा ही दिया गया है जैसा प्रचलित छपे संस्करणों में मिलता है। इस पेज का हर अर्थ हमने अपने शब्दों में लिखा है।