नमामि भक्त वत्सलं – अत्रि मुनि कृत श्रीराम स्तुति
नमामि भक्त वत्सलं – श्रीरामचरितमानस अरण्यकाण्ड में अत्रि मुनि द्वारा की गई श्रीराम स्तुति के बारह छंद।
हर खंड कम से कम दो स्रोतों से मिलाया गया है
अंतिम जाँच:
- रचयिता और परंपरा
गोस्वामी तुलसीदास (श्रीरामचरितमानस, अरण्यकाण्ड) की रचना।
- कब पढ़ा जाता है
राम-भक्त नित्य पूजा और रामनवमी जैसे अवसरों पर इसका पाठ करते हैं।
इस पाठ के बारे में
यह स्तुति गोस्वामी तुलसीदास रचित श्रीरामचरितमानस के अरण्यकाण्ड से है। जब श्रीराम, सीता और लक्ष्मण अत्रि मुनि के आश्रम पहुँचे, तब मुनि ने हाथ जोड़कर इन बारह छंदों में प्रभु की स्तुति की।
पाठ
छंद
नमामि भक्त वत्सलं । कृपालु शील कोमलं ॥
भजामि ते पदांबुजं । अकामिनां स्वधामदं ॥ १ ॥अर्थ
अत्रि मुनि कहते हैं: हे भक्तों से प्रेम करने वाले, कृपालु, शील और कोमल स्वभाव वाले प्रभु, मैं आपको नमस्कार करता हूँ; मैं आपके चरण-कमलों को भजता हूँ, जो निष्काम भक्तों को अपना धाम देते हैं।
छंद
निकाम श्याम सुंदरं । भवांबुनाथ मंदरं ॥
प्रफुल्ल कंज लोचनं । मदादि दोष मोचनं ॥ २ ॥अर्थ
आप अत्यंत श्याम और सुंदर हैं, संसार-सागर को मथने के लिए मंदराचल जैसे हैं, आपके नेत्र खिले कमल जैसे हैं, और आप मद आदि दोषों से छुड़ाने वाले हैं।
छंद
प्रलंब बाहु विक्रमं । प्रभोऽप्रमेय वैभवं ॥
निषंग चाप सायकं । धरं त्रिलोक नायकं ॥ ३ ॥अर्थ
हे प्रभु, आपकी भुजाएँ लंबी और पराक्रम अपार है, आपका वैभव माप से परे है; आप तरकश, धनुष और बाण धारण करने वाले तीनों लोकों के स्वामी हैं।
छंद
दिनेश वंश मंडनं । महेश चाप खंडनं ॥
मुनींद्र संत रंजनं । सुरारि वृंद भंजनं ॥ ४ ॥अर्थ
आप सूर्यवंश के आभूषण हैं, शिवजी का धनुष तोड़ने वाले हैं, मुनियों और संतों को आनंद देने वाले और देवताओं के शत्रुओं का नाश करने वाले हैं।
छंद
मनोज वैरि वंदितं । अजादि देव सेवितं ॥
विशुद्ध बोध विग्रहं । समस्त दूषणापहं ॥ ५ ॥अर्थ
कामदेव के शत्रु शिव जिनकी वंदना करते हैं, ब्रह्मा आदि देवता जिनकी सेवा करते हैं, जो विशुद्ध ज्ञान के शरीर हैं और सब दोषों को हरने वाले हैं —
छंद
नमामि इंदिरा पतिं । सुखाकरं सतां गतिं ॥
भजे सशक्ति सानुजं । शची पति प्रियानुजं ॥ ६ ॥अर्थ
उन लक्ष्मीपति को, जो सुख की खान और सज्जनों की गति हैं, मैं नमस्कार करता हूँ; शक्ति (सीता) और छोटे भाई (लक्ष्मण) सहित, इंद्र के प्रिय छोटे भाई (वामन रूप) प्रभु को मैं भजता हूँ।
छंद
त्वदंघ्रि मूल ये नराः । भजंति हीन मत्सराः ॥
पतंति नो भवार्णवे । वितर्क वीचि संकुले ॥ ७ ॥अर्थ
जो मनुष्य ईर्ष्या छोड़कर आपके चरणों के मूल को भजते हैं, वे तर्क-वितर्क की लहरों से भरे संसार-सागर में नहीं गिरते।
छंद
विविक्त वासिनः सदा । भजंति मुक्तये मुदा ॥
निरस्य इंद्रियादिकं । प्रयांति ते गतिं स्वकं ॥ ८ ॥अर्थ
जो एकांत में रहने वाले सदा मुक्ति के लिए प्रसन्नता से आपको भजते हैं, वे इंद्रियों आदि को त्यागकर अपनी (परम) गति को पाते हैं।
छंद
तमेकमद्भुतं प्रभुं । निरीहमीश्वरं विभुं ॥
जगद्गुरुं च शाश्वतं । तुरीयमेव केवलं ॥ ९ ॥अर्थ
उन एक, अद्भुत, इच्छा-रहित, सर्वव्यापी ईश्वर प्रभु को, जो जगद्गुरु, शाश्वत, तुरीय और केवल हैं —
छंद
भजामि भाव वल्लभं । कुयोगिनां सुदुर्लभं ॥
स्वभक्त कल्प पादपं । समं सुसेव्यमन्वहं ॥ १० ॥अर्थ
मैं भजता हूँ — जो भाव के प्रिय हैं, बुरे योगियों के लिए अत्यंत दुर्लभ हैं, अपने भक्तों के लिए कल्पवृक्ष हैं, सबके प्रति सम हैं और रोज सेवा करने योग्य हैं।
छंद
अनूप रूप भूपतिं । नतोऽहमुर्विजा पतिं ॥
प्रसीद मे नमामि ते । पदाब्ज भक्ति देहि मे ॥ ११ ॥अर्थ
अनुपम रूप वाले राजा, पृथ्वी-पुत्री (सीता) के पति को मैं प्रणाम करता हूँ। मुझ पर प्रसन्न होइए, मैं आपको नमस्कार करता हूँ; मुझे अपने चरण-कमलों की भक्ति दीजिए।
छंद
पठंति ये स्तवं इदं । नरादरेण ते पदं ॥
व्रजंति नात्र संशयं । त्वदीय भक्ति संयुताः ॥ १२ ॥अर्थ
स्तुति के अनुसार जो मनुष्य आदर से इस स्तुति को पढ़ते हैं, वे आपकी भक्ति से युक्त होकर आपके धाम को जाते हैं — इसमें संदेह नहीं, ऐसा कहा गया है।
इस पाठ के बारे में
सार्वजनिक (कॉपीराइट से मुक्त): पारंपरिक पाठ (गोस्वामी तुलसीदास (श्रीरामचरितमानस, अरण्यकाण्ड))।
पारंपरिक पाठ वैसा ही दिया गया है जैसा प्रचलित छपे संस्करणों में मिलता है। इस पेज का हर अर्थ हमने अपने शब्दों में लिखा है।
