आद्या स्तोत्रम्
आद्या स्तोत्रम् – समापन-पंक्ति के अनुसार ब्रह्मयामल के ब्रह्मा–नारद संवाद से माँ आद्या काली की स्तुति "शृणु वत्स प्रवक्ष्यामि", सम्पूर्ण २० श्लोकों का मूल संस्कृत पाठ।
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अंतिम जाँच:
- रचयिता और परंपरा
पारंपरिक पाठ।
- कब पढ़ा जाता है
बंगाल की काली-उपासना परम्परा में, विशेषकर आद्यापीठ (दक्षिणेश्वर) से जुड़े भक्तों में, इसका नित्य पाठ प्रचलित है।
इस पाठ के बारे में
आद्या स्तोत्रम् आदिशक्ति माँ आद्या (आद्या काली) की स्तुति है, जिसमें विभिन्न लोकों और तीर्थों में विराजमान देवी के रूपों का स्मरण और अंत में रक्षा की प्रार्थना है। इसकी पुष्पिका के अनुसार यह ब्रह्मयामल तन्त्र में ब्रह्मा–नारद संवाद के रूप में आता है।
पाठ
ब्रह्मोवाच
शृणु वत्स प्रवक्ष्यामि आद्यास्तोत्रं महाफलम् ।
यः पठेत् सततं भक्त्या स एव विष्णुवल्लभः ॥ १ ॥अर्थ
(ब्रह्मा कहते हैं:) हे वत्स, सुनो, मैं महान फल वाला आद्या स्तोत्र बताता हूँ; स्तोत्र के अनुसार जो इसे भक्ति से निरंतर पढ़ता है, वह विष्णु का प्रिय होता है।
ब्रह्मोवाच
मृत्युर्व्याधिभयं तस्य नास्ति किञ्चित् कलौ युगे ।
अपुत्रा लभते पुत्रं त्रिपक्षं श्रवणं यदि ॥ २ ॥अर्थ
स्तोत्र के अनुसार कलियुग में उसे मृत्यु या रोग का कोई भय नहीं रहता; और संतान की इच्छा वाले को तीन पक्ष तक इसे सुनने से संतान मिलती है — ऐसा कहा गया है।
ब्रह्मोवाच
द्वौ मासौ बन्धनान्मुक्ति विप्रवक्त्रात् श्रुतं यदि ।
मृतवत्सा जीववत्सा षण्मासं श्रवणं यदि ॥ ३ ॥अर्थ
स्तोत्र के अनुसार ब्राह्मण के मुख से दो महीने सुनने पर बंधन से मुक्ति मिलती है, और छह महीने सुनने पर संतान का सुख मिलता है।
ब्रह्मोवाच
नौकायां सङ्कटे युद्धे पठनाज्जयमाप्नुयात् ।
लिखित्वा स्थापयेद्गेहे नाग्निचौरभयं क्वचित् ॥ ४ ॥अर्थ
स्तोत्र के अनुसार नाव में, संकट में और युद्ध में इसे पढ़ने से जय मिलती है; इसे लिखकर घर में रखने से कहीं आग या चोर का भय नहीं रहता।
ब्रह्मोवाच
राजस्थाने जयी नित्यं प्रसन्नाः सर्वदेवता ।
ॐ ह्रीं ।
ब्रह्माणी ब्रह्मलोके च वैकुण्ठे सर्वमङ्गला ॥ ५ ॥अर्थ
स्तोत्र के अनुसार (पढ़ने वाला) राज-दरबार में सदा विजयी होता है और सब देवता प्रसन्न रहते हैं। ॐ ह्रीं। (देवी) ब्रह्मलोक में ब्रह्माणी और वैकुंठ में सर्वमंगला हैं।
ब्रह्मोवाच
इन्द्राणी अमरावत्यामम्बिका वरुणालये ।
यमालये कालरूपा कुबेरभवने शुभा ॥ ६ ॥अर्थ
अमरावती में इंद्राणी, वरुण के लोक में अंबिका, यम के लोक में काल-रूपा और कुबेर के भवन में शुभा हैं।
ब्रह्मोवाच
महानन्दाग्निकोणे च वायव्यां मृगवाहिनी ।
नैरृत्यां रक्तदन्ता च ऐशान्यां शूलधारिणी ॥ ७ ॥अर्थ
अग्नि कोण में महानंदा, वायव्य में मृगवाहिनी, नैऋत्य में रक्तदंता और ईशान में शूलधारिणी हैं।
ब्रह्मोवाच
पाताले वैष्णवीरूपा सिंहले देवमोहिनी ।
सुरसा च मणिद्विपे लङ्कायां भद्रकालिका ॥ ८ ॥अर्थ
पाताल में वैष्णवी रूप, सिंहल में देवमोहिनी, मणिद्वीप में सुरसा और लंका में भद्रकालिका हैं।
ब्रह्मोवाच
रामेश्वरी सेतुबन्धे विमला पुरुषोत्तमे ।
विरजा औड्रदेशे च कामाक्ष्या नीलपर्वते ॥ ९ ॥अर्थ
सेतुबंध में रामेश्वरी, पुरुषोत्तम (पुरी) में विमला, उड़ीसा में विरजा और नीलाचल पर्वत पर कामाख्या हैं।
ब्रह्मोवाच
कालिका वङ्गदेशे च अयोध्यायां महेश्वरी ।
वाराणस्यामन्नपूर्णा गयाक्षेत्रे गयेश्वरी ॥ १० ॥अर्थ
बंगाल में कालिका, अयोध्या में महेश्वरी, वाराणसी में अन्नपूर्णा और गया क्षेत्र में गयेश्वरी हैं।
ब्रह्मोवाच
कुरुक्षेत्रे भद्रकाली व्रजे कात्यायनी परा ।
द्वारकायां महामाया मथुरायां महेश्वरी ॥ ११ ॥अर्थ
कुरुक्षेत्र में भद्रकाली, ब्रज में परा कात्यायनी, द्वारका में महामाया और मथुरा में महेश्वरी हैं।
ब्रह्मोवाच
क्षुधा त्वं सर्वभूतानां वेला त्वं सागरस्य च ।
नवमी शुक्लपक्षस्य कृष्णस्यैकादशी परा ॥ १२ ॥अर्थ
आप सब प्राणियों की भूख हैं, समुद्र का किनारा हैं, शुक्ल पक्ष की नवमी और कृष्ण पक्ष की श्रेष्ठ एकादशी हैं।
ब्रह्मोवाच
दक्षसा दुहिता देवी दक्षयज्ञविनाशिनी ।
रामस्य जानकी त्वं हि रावणध्वंसकारिणी ॥ १३ ॥अर्थ
आप दक्ष की पुत्री देवी हैं, दक्ष के यज्ञ का नाश करने वाली हैं; आप ही राम की जानकी और रावण का विध्वंस करने वाली हैं।
ब्रह्मोवाच
चण्डमुण्डवधे देवी रक्तबीजविनाशिनी ।
निशुम्भशुम्भमथिनी मधुकैटभघातिनी ॥ १४ ॥अर्थ
आप चंड-मुंड के वध में देवी, रक्तबीज का नाश करने वाली, निशुंभ-शुंभ का मर्दन करने वाली और मधु-कैटभ को मारने वाली हैं।
ब्रह्मोवाच
विष्णुभक्तिप्रदा दुर्गा सुखदा मोक्षदा सदा ।
आद्यास्तवमिमं पुण्यं यः पठेत् सततं नरः ॥ १५ ॥अर्थ
स्तोत्र के अनुसार विष्णु-भक्ति देने वाली दुर्गा सदा सुख और मोक्ष देने वाली हैं; जो मनुष्य इस पवित्र आद्या-स्तुति को निरंतर पढ़ता है —
ब्रह्मोवाच
सर्वज्वरभयं न स्यात् सर्वव्याधिविनाशनम् ।
कोटितीर्थफलं तस्य लभते नात्र संशयः ॥ १६ ॥अर्थ
स्तोत्र के अनुसार उसे सब ज्वरों का भय नहीं रहता, सब व्याधियाँ दूर होती हैं, और वह करोड़ों तीर्थों का फल पाता है — इसमें संदेह नहीं।
ब्रह्मोवाच
जया मे चाग्रतः पातु विजया पातु पृष्ठतः ।
नारायणी शीर्षदेशे सर्वाङ्गे सिंहवाहिनी ॥ १७ ॥अर्थ
जया मेरे आगे से, विजया पीछे से, नारायणी सिर की और सिंहवाहिनी सारे अंगों की रक्षा करें।
ब्रह्मोवाच
शिवदूती उग्रचण्डा प्रत्यङ्गे परमेश्वरी ।
विशालाक्षी महामाया कौमारी शङ्खिनी शिवा ॥ १८ ॥अर्थ
शिवदूती, उग्रचंडा, परमेश्वरी हर अंग में (रक्षा करें); विशालाक्षी, महामाया, कौमारी, शंखिनी, शिवा —
ब्रह्मोवाच
चक्रिणी जयदात्री च रणमत्ता रणप्रिया ।
दुर्गा जयन्ती काली च भद्रकाली महोदरी ॥ १९ ॥अर्थ
चक्रिणी, जय देने वाली, रणमत्ता, युद्ध-प्रिया, दुर्गा, जयंती, काली, भद्रकाली, महोदरी —
ब्रह्मोवाच
नारसिंही च वाराही सिद्धिदात्री सुखप्रदा ।
भयङ्करी महारौद्री महाभयविनाशिनी ॥ २० ॥अर्थ
नारसिंही, वाराही, सिद्धिदात्री, सुख देने वाली, भयंकरी, महारौद्री और बड़े भय का नाश करने वाली (देवी मेरी रक्षा करें)।
ब्रह्मोवाच
॥ इति श्रीब्रह्मयामले ब्रह्मनारदसंवादे श्री आद्या स्तोत्रम् ॥
अर्थ
इस प्रकार श्री ब्रह्मयामल के ब्रह्मा-नारद संवाद का श्री आद्या स्तोत्र पूरा हुआ।
इस पाठ के बारे में
सार्वजनिक (कॉपीराइट से मुक्त): पारंपरिक पाठ (पारंपरिक)।
पारंपरिक पाठ वैसा ही दिया गया है जैसा प्रचलित छपे संस्करणों में मिलता है। इस पेज का हर अर्थ हमने अपने शब्दों में लिखा है।
